क्षेत्रीयता की समस्या और आज़ के युग का यथार्थ"

क्षेत्रीयता की समस्या और आज़ के युग का यथार्थ

प्रस्तावना:
भारत विविधताओं का देश है – भाषा, संस्कृति, खानपान और रीति-रिवाजों की विविधता इसकी पहचान है। परंतु जब यह विविधता कट्टरता और संकीर्ण मानसिकता का रूप ले लेती है, तब क्षेत्रीयता की समस्या उत्पन्न होती है। आज के युग में यह समस्या केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और राष्ट्रीय एकता के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुकी है।

क्षेत्रीयता की परिभाषा:

क्षेत्रीयता वह विचारधारा है, जहाँ व्यक्ति अपनी भाषा, क्षेत्र, राज्य या जातीय पहचान को प्राथमिकता देकर राष्ट्रहित से ऊपर रखता है। यह भावना स्वाभाविक है, परंतु जब यह अन्य क्षेत्रों या समुदायों के प्रति द्वेष में बदल जाती है, तब यह विघटनकारी बन जाती है।

क्षेत्रीयता के कारण:

  • राजनीतिक स्वार्थ: कुछ राजनीतिक दल क्षेत्रीय अस्मिता को उभारकर वोट बैंक की राजनीति करते हैं।
  • आर्थिक असमानता: विकास का असमान वितरण क्षेत्रों के बीच असंतोष को जन्म देता है।
  • भाषाई भेदभाव: भाषा के आधार पर दूसरों को अपमानित करना या नौकरियों से वंचित करना।
  • प्रवासियों के प्रति विरोध: महानगरों में क्षेत्रीय संगठनों द्वारा बाहरी लोगों पर हमले।
  • शैक्षिक एवं सांस्कृतिक भिन्नता: विभिन्न राज्यों में पाठ्यक्रम, साहित्य, सांस्कृतिक उत्सव अलग-अलग होते हैं, जो टकराव का कारण बनते हैं।

वर्तमान युग में क्षेत्रीयता के उदाहरण:

  • महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के खिलाफ विरोध और हमले।
  • नागालैंड एवं मणिपुर में बाहरी राज्यों के लोगों के प्रवेश पर विरोध।
  • तमिलनाडु में हिंदी विरोध आंदोलन।
  • राज्य पुनर्गठन की माँगें – जैसे विदर्भ, गोरखालैंड, तेलंगाना आदि।

क्षेत्रीयता के प्रभाव:

  • राष्ट्रीय एकता पर खतरा: "एक भारत श्रेष्ठ भारत" की भावना को क्षति।
  • सांप्रदायिकता और हिंसा: दंगे, प्रदर्शन और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान।
  • प्रशासनिक अराजकता: कानून-व्यवस्था का संकट और विकास कार्यों में बाधा।
  • राजनीतिक अस्थिरता: केंद्र और राज्यों के बीच टकराव।

समाधान:

  • राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाली शिक्षा प्रणाली का निर्माण।
  • सभी क्षेत्रों में समान विकास को प्राथमिकता।
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।
  • नागरिकों में संवैधानिक मूल्यों की समझ और सम्मान।
  • कठोर कानूनी प्रावधान – क्षेत्रीय हिंसा के खिलाफ त्वरित कार्रवाई।

निष्कर्ष:

क्षेत्रीय पहचान हमारी विविधता का हिस्सा है, परंतु जब यह देश की एकता को खतरे में डाले, तो हमें सजग हो जाना चाहिए। आज के युग का यथार्थ यह है कि हमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना से प्रेरित होकर क्षेत्रीयता के अंधकार से निकलकर राष्ट्रीयता के प्रकाश की ओर बढ़ना होगा। तभी हम भारत को एक सशक्त, समावेशी और उन्नत राष्ट्र बना सकेंगे।

"एकता में ही शक्ति है, विविधता में ही सुंदरता है।"

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